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dulhan

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DULHAN
“दुल्हन”

वो थी पीहर छोड़ आयी
ले के एक सपना नयन में
देखती थी नया जीवन
और नयी दुनिया सजन में
माँ की सब बातें संजो कर
लग पिता के गले रो कर
अँगना में परछन उड़ाकर
और सभी सखियाँ भुलाकर
वो चली सब छोड़ पीछे
अश्रु से नयनों को सींचे
है एक घरौंदे को सजाना
ख़ुद की है जगह बनाना
जिनको कल न जानती थी
उन सभी को है रिझाना
धैर्य कितना,कितना समर्पण
देह ,सपने सब हैं अर्पण
माँ से जो सीखा दिखाना
बाबा का सर न झुकाना
कल जवाब खुल के देती
आज सब है सुनते जाना
पर वो सब संभाल लेगी
खुद को झट से ढ़ाल लेगी
कितनी भी गहरी आये विपदा
अपनी गृहस्थी निकाल लेगी
सब के सपने सजाएगी वो
मकान को घर बनाएगी वो
ठीक जैसा ईश्वर है करता
एक दुनिया बसायेगी वो

#Hriday
#feature

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